“मधु-छत्ता “
मेरे छत्ते पर तुम बार बार मंडराती हो
रस मेरा पीकर तुम उड़
जाती हो
याद मेरी
आती तुमको पुन: मेरे पास आती हो
मीठी मीठी बातो के
द्वारा मुझको तुम रिझाती
हो |
भीन पंख की ध्वनि
तुम्हारी लता-स्वर जैसी लगती है
गम मेरा
हरती मन मे लबालब हर्ष
भरती है
मस्ती
चारो और छा
जाती मन को अति भाती है
दिल दुखाकर क्यों मक्खी
रानी
दूर भाग
जाती है |
अब मेरा मधु
खत्म हो गया है
पास न कोई अब मंडराता
है
मक्खी रानी न अब वह आती है
बिपत काल मे
न कोई अपना होता है |
डॉ. ऐम० ऐस० लाल
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