“ मेरी परी”
नजर पड़ी
मेरी हर जगह
कुछ भी न
देखा इधर उधर
वर्षा की
झाड़ी लग गई
पास मेरे आयी एक
परी |
मौन धारण किये खडी रही वह परी
पूछा काई बार परिचय मैने उसका
बिना बोले वह न जाने कहाँ चली
गई
ढूंडा हर जगह मैने उसे न पाया कही |
मेरे दिल
बस गई
उसकी सुरत
सही मे
वह थी हुसन की
परी
आंख मीन की
जैसी थी उसकी
गुलाबी ओठ थे गुलाब की पंखडी जैसी उसकी |
जीना मुश्कल हो गया उसके
बिना
कमबख्त मन भी
टिकता न उसके बिना
चैन आती
नही मुझे उसके बिना
रब मै अब जीवित रह सकता उसके बिना
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नरेश