" कुदरत का
करिश्मा "
बारिश
का योमन छाया है सब स्थान ,
गाव ,कस्बा डूब रहा मजबूर है इन्शान,
नतीजा है
इन्शान के बुरे करम
पल रहा है दुनीया मै नशुर,
बनकर | बारिश का ..|
'
नफरत जोरो से बढ़ रही सब
स्थान
मतलब धर्म का भूला है दुनेया का इन्शान
मजहब बहुत उन्दा
है भाई-चारा रखने का
अपने मतलब के वजाह से इन्शान बन गया हेमान |नफरत जोरो ...|.
दो रोटी न पचा सकता इन्शान करता
है दस रोटी का इन्तजाम,
बेमानी और घूस खोरी से बनाता आशियाना
आलीशान
अपनापन दुनीया मे ख़त्म हो गया अब हो गया इन्शान परेशांन
|दो रोटी,
कुदरत का करिश्मा समजता नही दुनीया का हर
इन्शान/
ऐम०ऐस० लाल (नरेश )
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