“ मढ़ गाँव के आंशु “
बसा हूँ मुम्बई के एकांत-कोने मे
मानव
जीवन न देखा कभी
आँशु
बहते सदा मेरे
पोंछने वाला कोई नही |
साफ़ सफाई
का नाम नही है
नेतागण शान से
कहते है
मढगाँव है स्वर्ग का आगन
डी. पी. प्लान है कुछ भी नही |
अशुविधा
का भंडार भरा यहाँ है
चिकित्सा
सेवा है कुछ भी नही
चिकत्सा – आपातकाल मे
अभागी मढकर जीवन खोते है सभी |
मढ़ गाँव
से वेर्सोया की यात्रा
खतरों से रहती है भरी
हाई
डाईट की यात्रा मे
जान
की बाजी रहती है खड़ी |
अक्सर
खबरी और बिल्डर की
सदा होती है ईद उनकी
प्रभावी सज्जन चैन की बंसरी
बजाते
दिवाली भी होती है उनकी |
नरेश ( ऐम० ऐस० लाल )
No comments:
Post a Comment