“एक याद “
सजाया काई बार मुहब्ब्त की मजलिस अपने आशियाने मै
न कोई बुलबुल आयी पास मुहब्बत के मजलिस मे |
बहुत चला
दूर दूर काटो के रास्तो पर खोज
मे उसके
खोज बेकार
हुई सारी बीत गयी
जवानी
मेरी |
उडती है रंग विरंगी
तितलिया मुम्बई की बगिया
मे
तस्बीर जवानी की आ जाती मेरी आँखों मे
घायल सुंदरी मिली
थी सीमा पर मुझे ६५
–पाक की जंग मे
बदनशीब हूँ मै इतना
उसको बचा नही पाया अपनी
जिन्दगी मे |
फुल चड़ाता हूँ उसकी कब्ब्रर पर अकशर जुम्मे
की शाम मे
दिया जलाकर
फातीया पढता और मिलता हूँ
उससे शाम मे
गुप्त गु होती
है उससे घंटो घंटो मेरी अक्शर
जुम्मे की शाम मे
जिन्दगी की
नाव चलाता हूँ
मै बस उसकी
याद मे |
डॉ. नरेश कानपुरवाला
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