“
सरिता “
पहाडो से
टकरा कर थल पर आती हो
कल कल करती मस्त होकर
बहती हो
चटानो से टकरा कर मस्त बहती हो
जन हित के लिये निस्वार्थ बहती हो |पहाड़ो से .. |
प्यास जन
जन की बुझाती हो
खेतो को हरा
भरा करती आगे आगे बढती हो
गन्दगी का भी तुम दिल से स्वागत करती
हो
सदेव तुम जन- कल्याण का
पाठ्य पढ़ाती हो |प्यास जन जन |
गंगा,जमुना ,रावी ,सतलुज
झेलम नर्बदा बुलाई जाती हो
आदर तुम् जन जन
से कराती हो
शंकर जी की
तुम याद दुनिया
को करती हो
खुम्भ
का मेला तुम प्रयागराज मे लगवाती हो |
“ नरेश “
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